Monday, April 26, 2010

कुपोषण में जकड़ा बचपन



राजस्थान पत्रिका पाली में प्रकाशन 23 अप्रेल 2010


कुपोषण में जकड़ा बचपन


राजेश दीक्षित


पाली जिले के मासूमों के शरीर कुपोषण के मारे सिकुड़ रहे हैं। इसका कारण गरीबी हो या कोई और। सरकारी आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि जिले में कुपोषण की स्थिति काफी भयावह है। आंगनबाड़ी केन्द्रों पर पोषाहार लेने आने वाले 48 फीसदी बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं। इसके अलावा 5 फीसदी अति कुपोषित हैं। गौर करने की बात यह है कि जब सरकारी आंकड़े ही इतने हैं तो हकीकत इससे कहीं ज्यादा खतरनाक होगी। हालांकि कुपोषित बच्चों की चिकित्सा व पोषक आहार देने के लिए बांगड़ अस्पताल में कुपोषण केन्द्र भी खोला गया लेकिन आंगनबाड़ी केन्द्रों ने उनके यहां आने वाले कुपोषित बच्चों को कुपोषण केन्द्र भेजने के प्रति रुचि ही नहीं दिखाई। सिर्फ गिने-चुने बच्चे ही इस केन्द्र से लाभान्वित हो सके। महिला एवं बाल विकास विभाग ने भी इस बात को स्वीकारा है कि राज्य के छह जिलों में कुपोषण से पीडि़त बच्चों की संख्या अधिक है, इनमें पाली जिला भी शामिल है।


चलेगा विशेष अभियान


कुपोषण मुक्ति के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग प्रदेश में विशेष अभियान चलाएगा। अभियान के लिए पाली, डूंगरपुर, झाालावाड़, अलवर, बीकानेर व बांसवाड़ा जिले का चयन किया गया। इसके तहत रोगग्रस्त अति कुपोषित बच्चों का केन्द्रों पर नि:शुल्क उपचार किया जाएगा। अभिभावकों को ३० रुपए दैनिक दिए जाएंगे।


मिलता है पौष्टिक आहार


आंगनबाड़ी केन्द्रों पर बच्चों को पोषाहार दिया जाता है। अति कुपोषित बच्चों का साप्ताहिक वजन लेकर उनकी देखरेख कर पृथक से पूरक पोषाहार दिया जाता है। प्रोटीन और विटामिन से भरपूर बेबी मिक्स और दलिया-खिचड़ी दी जाती है। समय-समय पर चिकित्सकों व एएनएम से जांच कराई जाती है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व अन्य कर्मचारी अभिभावकों को बच्चों को पौष्टिक आहार देने की जानकारी देते हैं।


जिले में कुपोषित बच्चे


आंगनबाड़ी केन्द्रों पर बच्चे - 57,778


कुपोषित बच्चे - 28,000


अति कुपोषित बच्चे - 3322


पाली शहर के हालात


आंगनबाड़ी केन्द्रों पर बच्चे - 6687


कुपोषित बच्चे - 2709


अति कुपोषित बच्चे - 364


वजन के आधार पर होती जांच


बच्चों के कुपोषित व सामान्य होने की जांच वजन के आधार पर की जाती है। 5 वर्ष तक के बच्चों के लिए अलग-अलग समय पर अलग-अलग वजन निर्धारित है। निर्धारित से कम वजन होने पर बच्चा कुषोषित श्रेणी में माना जाता है और ज्यादा ही कम वजन होने पर अति कुपोषित माना जाता है।


बच्चे का सामान्य वजन


वर्ष वजन


एक 10


दो 12


तीन 14


चार 16


पांच 18


काम नहीं आया कुपोषण केन्द्र


कुपोषण के शिकार कई बच्चों की हर साल मौत हो जाती है। राजस्थान में स्थिति काफी गम्भीर है। इसी के मद्देनजर 'राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन' की ओर से राजकीय बांगड़ अस्पताल में कुपोषण उपचार केन्द्र खोला गया। यहां अति कुपोषित बच्चों को अस्पताल में भर्ती कर पौष्टिक आहार दिया जाता है लेकिन इसका लाभ कुपोषित बच्चों को नहीं मिल रहा है। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि महिला एवं बाल विकास विभाग को सूचित कर दिया है लेकिन विभाग ने अब तक एक भी अति कुपोषित बच्चे को केन्द्र में भर्ती नहीं कराया।


मां पकाएगी भोजन


कुपोषण केन्द्र में कुपोषित बच्चे की मां ही पौष्टिक भोजन पकाकर बच्चे को खिलाएगी। इसका मकसद मां को पौष्टिक भोजन पकाने का तरीका सिखाना है। अस्पताल में भर्ती कुपोषित बच्चे के साथ ही मां को भी रखा जाएगा। इसके लिए मां को रोजाना तीस रुपए दिए जाएंगे।


आठ पलंग और रसोई


कुपोषण उपचार केन्द्र आठ बेड का है। इसमें एक बेड पर कुपोषित बच्चा व मां दोनों रहेंगे। केन्द्र में एक रसोई बनाई गई है। इसमें आहार पकाने का सामान है। केन्द्र में नर्सिंग स्टॉफ व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व्यवस्थाएं संभालेंगे।


पांच वर्ष से छोटे बच्चे रहेंगे


केन्द्र में गम्भीर रूप से कुपोषित पांच वर्ष तक के बच्चों को रखा जाएगा। इसकी पहचान बच्चे की औसत उम्र व वजन के आधार पर की जाती है। बच्चे का सामान्य वजन से बीस प्रतिशत वजन कम है तो स्थिति सामान्य मान ली जाती है लेकिन सामान्य वजन से साठ फीसदी कम होने पर गम्भीर कुपोषित की श्रेणी होती है।


यह होता है कुपोषण


शरीर के लिए आवश्यक संतुलित आहार लम्बे समय तक नहीं मिलना ही कुपोषण है। कुपोषण के कारण बच्चों व महिलाओं की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। इससे वे कई बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। स्त्रियों में रक्ताल्पता व घेंघा व बच्चों में सूखा व रतौंधी रोग कुपोषण के ही परिणाम हैं।


कुपोषण के लक्षण


- शरीर की वृद्धि रुकना।


- मांसपेशियां ढीली होना अथवा सिकुड़ जाना।


- झाुर्रियों युक्त पीले रंग की त्वचा।


- कार्य करने पर शीघ्र थकान आना।


- मन में उत्साह का अभाव, चिड़चिड़ापन तथा घबराहट होना।


- बाल रुखे और चमक रहित होना।


- आंखें धंसी व उनके चारों ओर काला वृत्त बनाना।


- शरीर का वजन कम होना तथा कमजोरी


- नींद तथा पाचन क्रिया का गड़बड़ा जाना।


- हाथ-पैर पतले और पेट बढ़ा होना या शरीर में सूजन आना।


...........


राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 3 (एनएफएचएस-3) बताता है कि देश में छह साल से कम उम्र के आठ करोड़ बच्चे कुपोषित हैं। फूला पेट, अविकसित कद-काठी, झारते बाल और फीके रंग के साथ जी रहे हैं। एक साल के बच्चे का वजन औसतन दस किलोग्राम होता है। उसके वजन में सालाना दो किलोग्राम बढ़ोतरी होना जरूरी है। मगर जब बच्चों का वजन सामान्य से कम होने लगता है तो यह कुपोषण की स्थिति है। ऐसी स्थिति में उसकी बीमारियों से लडऩे की क्षमता कम हो जाती है। ऐसे बच्चों को अधिक से अधिक प्रोटीन, कार्बोहाइडे्रट, आयरन, विटामिन-बी, कैल्शियम आदि मिलना चाहिए। यहां बच्चों में कुपोषण का मुख्य कारण गरीबी, उचित पालन-पोषण का अभाव और उनके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की गिरती स्थितियां है। उनके आस-पास के माहौल में साफ-सफाई और पीने का स्वच्छ पानी न होने के कारण यह और अधिक गहराता जा रहा है।


- यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के ६ करोड़ से ज्यादा बच्चे भूखे सोने को मजबूर हैं।


- भारत के महापंजीयक कार्यालय द्वारा जारी प्रतिवेदन का ही अध्ययन करें तो देश में वर्ष २००८ में नवजात शिशु मृत्यु दर एक हजार बच्चों पर ५३ फीसदी थी।


- निमोनिया, डायरिया और अन्य रोगों के कारण जिन बच्चों की मौत होती है। उनमें से एक तिहाई से अधिक अगर कुपोषण का शिकार न हों तो उन्हें बचाया जा सकता है।


- जो महिलाएं पहले से ही कुपोषण का शिकार हैं तो वे कुपोषित बच्चों को जन्म देती हैं। अगर जन्म के बाद भी बच्चे को संतुलित आहार नहीं मिल पाए तो वह जिंदगी भर कुपोषित बना रहता है।


- भारत में हर तीन गर्भवती महिलाओं में से एक कुपोषण की शिकार होने के कारण खून की कमी अर्थात रक्ताल्पता की बीमारी से ग्रस्त हो जाती है। हमारे समाज में स्त्रियां अपने स्वयं के खान-पान पर ध्यान नहीं देती जबकि गर्भवती महिलाओं को ज्यादा पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है। उचित पोषण के अभाव में गर्भवती महिलाएं स्वयं तो रोगग्रस्त होती ही हैं, साथ ही होने वाले बच्चे को कमजोर और रोग ग्रस्त बना देती हैं। अक्सर महिलाएं पूरे परिवार को खिलाकर स्वयं बचा हुआ रूखा-सूखा खाना खाती हैं, जो उनके लिए अपर्याप्त होता है।






रोजाना आते हैं दस फीसदी कुपोषित बच्चे


राजकीय बांगड़ अस्पताल के ओपीडी में रोजाना आने वाले बच्चों में से करीब दस फीसदी कुपोषण्ध का शिकार होते हैं। संतुलित आहार के लिए प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन व मिनरलस जरूरी है। गरीब परिवार के बच्चे कुपोषण ही चपेट में ज्यादा आते हैं। इनमें लड़कियां अधिक हैं। अशिक्षा के कारण महिलाएं अधिक बच्चों को जन्म देती हैं। ऐसी स्थिति में अंतिम बच्चे में कुपोषण के लक्षण ज्यादा मिलते हैं। इसी तरह दो बच्चों के जन्म में कम अंतराल रखने पर गर्भवती को पूरा आहार नहीं मिल पाता, इससे नवजात के कुपोषित पैदा होने की आशंका बन जाती है। जिले में रोजाना चार-पांच बच्चे कुपोषित पैदा होते हैं। जन्म के समय नवजात का वजन एक से ढाई किलो के बीच होना कुपोषण है। कुपोषित बच्चे की मौत की ज्यादा आशंका रहती है। कुपोषित नवजात में हाइपोग्लासिमिया (ग्लूकोज की कमी), हाइपोकैल्शियम (कैल्शियम की कमी), हाइपोथरमिया (नवजात का शरीर ठंडा पडऩा) व संक्रमण हो जाता है।


- डॉ. देवेन्द्र चौधरी, शिशु रोग विशेषज्ञ, राजकीय बांगड़ चिकित्सालय


..........................................


हर रोज चार कुपोषित बच्चों का जन्म


नवजात का वजन कम होना कुपोषण है। जिले में कम वजन के बच्चों की संख्या पर नजर डालें तो स्थिति चिंताजनक है। सामान्य नवजात का वजन ढाई किलो होता है जबकि जिले में हर रोज चार बच्चे ऐसे पैदा हो रहे हैं जिनका वजन डेढ़ किलो से भी कम है। ऐसे बच्चों को संभालना, स्तनपान कराना और उन्हें स्वस्थ बनना कठिन हो जाता है। ढाई किलो से कम वजन के बच्चों का आंकड़ा इससे कई ज्यादा है। कुल मिलाकर पिछले तीन माह में ही नौ फीसदी से अधिक बच्चे कम वजन के पैदा हुए हैं।


कम वजन के बच्चों की स्थिति


माह जन्म लेने वाले बच्चे डेढ़ किलो से कम डेढ़ व ढाई किलो के बीच


जनवरी 3205 48 308


फरवरी 3303 42 288


मार्च 3077 30 221


कुल 9585 120 817






............................................................................................................................................


.........................................................................................................................................