Saturday, September 18, 2010

बाबा रामदेव से आशीर्वाद लेते राजेश दीक्षित


18 सितम्बर-2010 को योग गुरु बाबा रामेदव पाली आए। इस दौरान वे राजस्थान पत्रिका कार्यालय भी पधारे। इस अवसर पर पत्रिका संवाददाता राजेश दीक्षित उनसे आर्शीवाद लेते हुए

Sunday, August 22, 2010

पालिका चुनाव

पालिका चुनाव
राजेश दीक्षित
सत्ता की लहर में मतदाता
लोकसभा, निकाय, पंचायत और फिर निकाय चुनाव में कांग्रेस की जिले में चौतरफा लहर
२० अगस्त-2010
पाली। पाली जिले का मतदाता पिछले दो साल से राज्य की सत्ता के संग चल रहा है। विधानसभा चुनाव में जिले में कांग्रेस को करारी हार देखनी पड़ी हो, लेकिन इसके बाद जितने भी चुनाव हुए सभी में कांग्रेस ने भाजपा को चारों खाने पटकनी ही दी है। शुक्रवार की मतगणना के बाद आए नतीजे इस बात के गवाह हैं कि मतदाताओं ने कड़ी से कड़ी जोडऩे का काम किया है।
दिसम्बर 2008 में राज्य में विधानसभा चुनाव हुए। परिसीमन के बाद जिले में आठ के स्थान पर छह विधानसभा बनाई गई। इन विधानसभाओं में चार में भाजपा तो एक जगह कांग्रेस ने जीत दर्ज की, तो एक विधानसभा में कांग्रेस से बागी निर्दलीय प्रत्याशी जीते। राज्य में कांग्रेस ने सरकार बनाई। इसके बाद से तो जिले में कांग्रेस की लहर ही दौड़ती चली गई, लोकसभा के चुनाव हों या फिर निकाय, पंचायत राज के। सभी जगह कांग्रेस ने ही परचम लहराया।
विधानसभा के बाद मई 2009 में लोकसभा के चुनाव हुए। परिसीमन के कारण लोकसभा संसदीय क्षेत्र आठ विधानसभाओं का हो गया। जिसमें से पांच पाली और तीन जोधपुर जिले की विधानसभाएं शामिल थी। जिले की एक विधानसभा जैतारण को राजसमंद संसदीय क्षेत्र में शामिल कर दिया गया। लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी की करारी हार हुई और कांग्रेस के बद्रीराम जाखड़ विजयी हुए।
लोकसभा चुनाव के छह माह बाद ही नवम्बर-2009 में राज्य में 46 निकायों के चुनाव हुए, उसमें पाली जिले के दो निकाय पाली नगर परिषद व सुमेरपुर नगरपालिका भी शामिल थे। इस चुनाव में पाली नगर परिषद में कांग्रेस तो सुमेरपुर नगरपालिका में भाजपा का कब्जा रहा।
दो माह बाद पंचायतराज चुनाव आ गए। जनवरी-फरवरी- 2010 में पंचायत चुनावों में कांग्रेस ने परचम लहराया। पाली जिला परिषद कांग्रेस के जिला प्रमुख बने और जिला परिषद की 33 सीटों में से 25 सीटों पर कांग्रेस तो 8 सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की। दस पंचायतों में जैतारण पंचायत समिति को छोड़कर नौ पंचायतों में कांग्रेस के प्रधान बने। जैतारण में कांग्रेस का बहुमत था, लेकिन यह सीट कांग्रेस के अंदरूनी झागड़े के कारण भाजपा के हाथ चली गई। इसके बाद शुक्रवार को आए परिणामों में भी कांग्रेस के प्रति मतदाताओं का रूझाान साफ तौर से देखने को मिला। सात पालिकाओं में से छह पालिकाओं में कांग्रेस के पालिकाध्यक्ष चुने गए हैं। इस तरह अब जिले की नौ निकायों में से सात पर कांग्रेस, एक भाजपा व एक निर्दलीय का कब्जा है।

जिले का राजनीतिक धरातल--एक नजर में

जिले का राजनीतिक धरातल--एक नजर में

- विधानसभा की स्थिति

जिले में छह विधानसभा- भाजपा-4, कांग्रेस-1, निर्दलीय-1

विधानसभा विधायक पार्टी

पाली                     ज्ञानचंद पारख                भाजपा

बाली                       पुष्पेन्द्र सिंह                  भाजपा

मारवाड़ जंक्शन      केसाराम चौधरी           भाजपा

सोजत                      संजना आगरी             भाजपा

सुमेरपुर                 बीना काक                     कांग्रेस

जैतारण                 दिलीप चौधरी               निर्दलीय

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लोकसभा

सांसद- बद्रीराम जाखड़- कांग्रेस

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पाली जिले में निकाय- नौ

कांग्रेस- 7 (रानी, बाली, सोजत, तखतगढ, सादड़ी, फालना, पाली)

भाजपा-1 (सुमेरपुर)

निर्दलीय-1 ( जैतारण)



-नगरपरिषद पाली-

सभापति-केवलचंद गुलेच्छा-कांग्रेस

उपसभापति- कांग्रेस- शमीम मोतीवाला

परिषद में पार्षद-45

कांग्रेस-21

भाजपा-18

निर्दलीय-6

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-जिला परिषद, पाली

जिला प्रमुख- कांग्रेस-खुशवीर सिंह

उपजिलाप्रमुख-कांग्रेस-भीखाराम सीरवी

जिला परिषद सदस्य-33

कांग्रेस-25

भाजपा-8

निर्दलीय-0



-पंचायत समिति-10

कांग्रेस-9 (पाली, रोहट, मारवाड़ जंक्शन, सुमेरपुर, देसूरी, सोजत, रायपुर, रानी व बाली )

भाजपा-1 (जैतारण)



दसों पंचायत समिति में सदस्य-192

कांग्रेस-110

भाजपा-60

निर्दलीय-22

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Saturday, May 29, 2010

राजीव गांधी और पाली

  राजीव गांधी और पाली
21 मई 2010


दिल में समाई हैं राजीव की वो यादें


राजेश दीक्षित
पाली। राजीव गांधी को इस दुनिया से अलविदा हुए आज भले ही 19 वर्ष हो गए हैं लेकिन अब भी पाली के कुछ शख्स ऐसे हैं जिनके दिल में उनकी यादें, उनके साथ बिताए संस्मरण और उनकी छवि बसी हुई हैं। जब भी गांधी की जयंती या पुण्यतिथि आती हैं तो वे उन पलों को याद करना नहीं भूलते। उनकी आंखों ने उस शख्स को नजदीक से देखा है। नई पीढ़ी के बहुत ही कम लोगों को यह याद भी नहीं होगा कि प्रधानमंत्री पद पर रहे राजीव ने पाली की धरा पर तीन बार कदम रखा। यहां के लोगों से मिले-जुले। मारवाड़ी व्यंजनों का लुत्फ लिया। जिस अम्बेडकर सर्किल से दिन में कई बार गुजरते हैं उस अम्बेडकर की प्रतिमा का अनावरण करने के लिए राजीव पाली आए थे। ' राजस्थान पत्रिका' ने राजीव की पुण्यतिथि के अवसर पर उनके साथ कुछ पल बिताए उन लोगों से उनकी यादों को ताजा किया।
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पाली और राजीव गांधी
- 28 अक्टूबर-1983: जब राजीव गांधी राष्ट्रीय महामंत्री बने, उस समय उन्होंने पूरे राजस्थान का दौरा किया। दौरे के दौरान उदयपुर से होते हुए वे पाली जिले में प्रवेश किया। रणकपुर में कार्यकर्ताओं से मुलाकात की और उनके साथ भोजन भी किया। भोजन में कैर, सांगरी, बाजरी का सोगरा, लस्सी कढी (खाटा) खिलाया था। यहां से वे सादड़ी गए, वहां आम सभा रखी गई। इसके बाद पाली आए, यहां बांगड़ स्कूल मैदान में सभा को सम्बोधित किया। यहां से कांग्रेस भवन होते हुए अम्बेडकर प्रतिमा का अनावरण किया।


-1988-में दूसरी बार सूखा बनाम सेवादल के दौरान राजीव गांधी चाणोद आए थे। यहां उन्होंने तालाब का निरीक्षण किया। सूखा प्रभावित क्षेत्रों को देखा। इस दौरान क्षेत्रीय विधायक बीना काक व राजस्थान प्रदेश कमेटी के अध्यक्ष अशोक गहलोत साथ थे।


- तीसरी बार 1989 के लोकसभा चुनाव में राजीव का चुनाव प्रचार के लिए पाली आना हुआ। इस समय कांग्रेस ने लक्ष्मीमल सिंघवी को टिकट दिया। वे बांगड़ स्टेडियम में आए और चुनावी सभा को सम्बोधित किया। यहां भी उन्होंने कहा था कि उपर से एक रुपए आते हैं तो नीचे आते-आते दस पैसे रह जाते हैं। इस दौरान वे स्वतंत्रता सेनानाी खुमाराम ओड के घर गए। वहां उन्होंने चाय-नाश्ता किया व परिवार के सदस्यों से मिले।



...और कार्यकर्ता आ गए गाड़ी के आगे
- 1983 में अम्बेडकर प्रतिमा के अनावरण समारोह में जब राजीव पाली आए थे, उस समय बांगड़ स्कूल में सभा रखी गई थी। यहां उनको कार्यकर्ताओं ने सिक्कों से तोला था। कार्यक्रम के बाद जब वे प्रतिमा अनावरण के लिए जाने लगे तब यूथ कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ता उन्हें कांग्रेस भवन ले जाना चाहते थे, ताकि जर्जर पड़े कांग्रेस भवन में कुछ सुधार हो सके। बाद में कलक्ट्री चौराहे के पास यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता जमीन पर लेट गए। राजीव गांधी ने पुलिस अधिकारियों से पूछा क्या मामला है। जब उन्हें जानकारी दी तो वे कांग्रेस भवन जाने को तैयार हो गए। यहां उन्हें भवन की जर्जर स्थिति के बारे में बताया और सुधार के लिए कहा। स्वतंत्रता सेनानी धनराज वर्मा जो उस समय कांग्रेस के जिला महामंत्री थे उन्होंने राजीव को रोते हुए बताया कि कांग्रेस भवन मंदिर की स्थिति बेकार है।




अजमेर से लाए थे काले गुलाब
नगर परिषद में कार्यरत रविन्द शर्मा बताते हैं कि राजीव को काले गुलाब पसंद थे। मूर्ति अनावरण समारोह परिषद ने कराया था। काले गुलाब की कलियां लाने के लिए मुझो अजमेर नगर परिषद भेजा था। वहां से काले गुलाब की कलियां लेकर पाली आया।




मूर्ति का अनावरण
डॉ. भीमराव अम्बेडकर प्रतिमा का अनावरण राजीव गांधी (संसद सदस्य) ने 28 अक्टूबर 1983 को किया। इस दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर ने अध्यक्षता की।


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संस्मरण..........................................


पापा को मामा कहकर बुलाते थे
- राजीवजी मेरे पापा स्वतंत्रता सेनानी खुमाराम ओड को मामाजी कहकर बुलाते थे। इंदिरा गांधी ने साबरमती आश्रम में पापा को राखी बांधी थी। तब से वे इंदिराजी को धर्मबहन मानने लगे। सूखा बनाम सेवादल एवं प्रधानमंत्री फॉलोअप कार्यक्रम हुआ था। उस समय उनसे दिल्ली में मुलाकात हुई। उस समय मैं कांग्रेस सेवादल में अध्यक्ष था। मेरे हाल पूछे तो उनसे कहा, अंग्रेजों ने मेरे पिता को चाणोद रियासत की जेल में डाला था। वहां आप एकबार सपत्नी पधारें। बाद में वे चाणोद भी आए। यहां उन्हें तत्कालीन राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक गहलोत की प्रेरणा से राजस्थान केनाल का पानी जोधपुर लिफ्ट केनाल को दिए जाने के लिए ज्ञापन दिया था। इस दौरान उनकी पत्नी सोनिया गांधी व क्षेत्रीय विधायक बीना काक भी साथ थी।
-मेवाराम ओड, कांग्रेस कार्यकर्ता






- 20 मई 1991 को सुबह ग्यारह बजे सिरोही के रामझारोखा मैदान में राजीव की सभा थी। उस समय उनका लोकसभा चुनाव के लिए दौरा था। तब उन्हें देखने व सुनने का मौका मिला। एक दिन बाद जैसे ही उनकी मौत का समाचार मिला तो विश्वास ही नहीं हुआ। इसके अलावा तिरुपति में यूथ कांग्रेस का सम्मेलन हुआ था। उसमें मैं, कृपाशंकर त्रिवेदी, सीताराम टांक, कमल जैन सहित सात यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता पाली से गए थे। वहां हम लोग एक धर्मशाला में ठहरे। उस समय राजीवजी धर्मशाला आए और सभी कार्यकर्ता से कुशलक्षेम पूछी। उस दौरान वे हमारे कमरे में भी आए। तभी उन्हें बहुत ही नजदीक से देखने का सौभाग्य मिला।
-मोटू भाई, अध्यक्ष वित्त समिति, नगरपरिषद






-राजीव गांधी के साथ कोई विशेष मुलाकात तो नहीं है। लेकिन एक बार लोकसभा चुनाव में प्रचार के लिए पाली आए। उस दौरान वे प्रधानमंत्री थे। सभा के लिए मैं कार्यकर्ताओं की बस लेकर जोजावर से पाली आया था। पहली बार राजीव को देखा था। चेहरा देखने के बाद अहसास हुआ था अलौकिक शक्ति उसके पीछे है। प्रिंस की तरह लग रहे थे। उनका चेहरा काफी हंसमुख था।
-खुशवीर सिंह, जिला प्रमुख






-1983 में जब वे रणकपुर होते हुए पाली आए थे, तब वे सादड़ी में रुके थे। उस समय में सरकारी सेवा में था। उसी समय कुछ समय के लिए उनके साथ रहने का मौका मिला। वे हंसमुख थे। गरीबों की सेवा करने वाले थे।
-सीडी देवल, अध्यक्ष, जिला कांग्रेस कमेटी




मौत से दो दिन पूर्व मुलाकात
- राजीव की मृत्यु से दो दिन पहले उदयपुर में मुलाकात हुई। इस समय लोकसभा चुनाव का माहौल था। पाली लोकसभा से सी.धर्मीचंद जैन को टिकट दिया गया था। मुलाकात होने पर उन्होंने मुझो बुलाया और कहा कि मैं माधोसिंह दीवान से कहूं कि वे कांग्रेस प्रत्याशी धर्मीचंद की मदद करें। हमने भी राजीवजी से कहा कि वे चुनाव के लिए धर्मीचंद को दिल्ली से आर्थिक मदद कराएं। दो दिन बाद ही उनकी मौत का समाचार से गहरा धक्का लगा। 1988 के बाद पड़े अकाल में वे चाणोद आए। उस समय मैं सभापति था। यहां उन्हें जिले में अकाल की स्थिति से अवगत कराया।
-केवलचंद गुलेछा, सभापति, नगरपरिषद














Wednesday, May 19, 2010

नगर परिषद पाली में अब तक के सभापति

नगर परिषद पाली में अब तक के सभापति




सभापति कार्यकाल पार्टी



१.ए एच थामस ५.१.४५ से १.७.४८



२.रामसुख गुप्ता २.७.४८ से ३१.६.५९ कांग्रेस



३.रामसुख गुप्ता १.८.५९ से ११.६.६१ कांग्रेस



४.मूलचंद डागा १२.६.६१ से २४.६.६६ कांग्रेस



५.डी.डी.सोलंकी २५.६.६६ से २०.६. ६९



६.मूलचंद डागा ३.११.७० से १३.४.७२ कांग्रेस



७.देवीचंद लोढा १४.४.७२ से २३.८.७३



८.अशोक भाटी २४.८.७३ से २०.९.७३ कार्यवाहक



९.मूलचंद डागा २१.९.७३ से ११.१२.७३ कांग्रेस



१०.केवलचंद गुलेच्छा ३०.१.८७ से १५.१.८९ कांग्रेस



११.डॉ. मो. इकबाल १६.१.८९ से २८.३.८९ कार्यवाहक कांग्रेस



१२.पुरुषोत्तम गर्ग २८.३.८९ से १९.४.८९ कार्यवाहक कांग्रेस



१३.मांगीलाल गांधी १९.४.८९ से २८.१.९२ कांग्रेस



१४.ज्ञानचंद पारख २९.११.९४ से २८.११. ९९ भाजपा



१५.कुसुम सोनी २८.११.९९ से २७.११.०४ भाजपा



१६.प्रदीप हिंगड़ २७.११.०४ से ११.६.०७ कांग्रेस



१७.राकेश भाटी ११.६. ०७ से १६.८.२००७ ..... भाजपा कार्यवाहक



१८.प्रदीप हिंगड़ १६.८.२००९............ से अब तक कांग्रेस



19.केवलचंद गुलेच्छा- 26.11.2009 से

Monday, May 17, 2010

सिंदूर में खोया बचपन



सिंदूर में खोया बचपन


अधिक उम्र में शादी के क्रेज के बीच बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं अब भी हमारे समाज के लिए नासूर बनी हुई हैं। इस कुप्रथा को रोकने के लिए न जाने कितने कानून बनाए गए। हर साल बाल विवाह रोकने के लिए सरकार ने भी नए-नए आदेश जारी किए, लेकिन सामाजिक बुराई नहीं रुक रही है। पाली जिला भी बाल विवाह जैसी बुराई से अछूता नहीं है। हर साल आखातीज पर नन्हें-नन्हें मासूम बच्चे विवाह की डोर में बंध रहे हैं, लेकिन प्रशासनिक अमला इन विवाहों को रोकने में पूरी तरह से ही नाकाम ही रहा है। सामाजिक बुराई को समाप्त करने के लिए कानून के डंडे की अपेक्षा सामाजिक जागरूकता बहुत जरुरी है, और इसी जागरूकता के अभाव के कारण ही यह सामाजिक परम्परा आज भी कायम है। खेलने-कूदने व पढने-लिखने की उम्र में बालिकाएं माथे पर सिंदूर लिए घूमती है। सिंदूर ने उनका बचपन छीन लिया है।


पाली में बाल विवाह की स्थिति


- हर साल डेढ हजार, कम उम्र की मां
-सरकार लाख कोशिशों के बाद भी बाल विवाह को रोकने में सफल नहीं हो पा रही है। कम उम्र में शादी का मतलब सीधा-सीधा है कि खेलने-कूदने व स्कूल जाने की उम्र में लड़की की गोद में बच्चे खेलने लग जाती है। लड़की छोटी सी उम्र में ही मां बन जाती है। ऐसी स्थिति में लड़की व बच्चे के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है।
जिले में स्थिति बड़ी भयावह है। बाल विवाह का ही नतीजा है कि जिले में हर माह और एक सौ बीस छोटी उम्र की लड़कियां गर्भ धारण कर रही है। चिकित्सा विभाग के आंकड़े बड़े चौकाने वाले हैं। वर्ष 2008-09 में 1455 ऐसी महिलाएं गर्भवती हुई जिनकी उम्र केवल 15 से 19 वर्ष के बीच थी।
जबकि स्त्रीरोग विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भधारण करने की सही व उचित उम्र 21 से 30 वर्ष के बीच है। कम उम्र में गर्भधारण करना जच्चा-बच्चा दोनों के लिए मुसीबत ही है।


कम उम्र में मां बनने के नुकसान
- कम उम्र की महिलाओं में गर्भकाल के दौरान खून की कमी, ब्लड प्रेशर ज्यादा होना, डिलेवरी के समय ब्लीडिंग होना, बच्चेदानी फट जाना व तकलीफ से डिलीवरी होने की संभावना बनी रहती है।
बाल विवाह जैसी कुप्रथा के चलते जल्द उम्र में शादी होने से कम उम्र में ही महिला मां बन जाती है। कई बार 15-16 की उम्र में ही गर्भधारण कर लिया जाता है। ऐसी स्थिति के दौरान गर्भाशय परिपक्व नहीं होने के कारण गर्भ में पल रहा शिशु पूर्ण विकसित नहीं हो पाता है। इसके अलावा गर्भ धारण करने में अंतर नहीं होने पर शिशु की सेहत कमजोर हो जाती है। कम उम्र में मां बनने से शिशु का वजन कम होता है। इससे कई समस्याएं आती हैं।


कम उम्र में मां, ना बाबा ना
कम उम्र में मां बनने के भी कई मामले सामने आ रहे हैं। इससे न मां का स्वास्थ्य सही रहता है और न ही बच्चे का। बल्कि कम उम्र में गर्भधारण करना खुद व बच्चे की मौत को बुलाने के समान ही है। कई मामलों में तो गर्भपात हो जाता है। बच्चा कमजोर पैदा होगा या फिर विमंदित। एक सप्ताह से लेकर एक साल के अंदर बच्चे की मौत भी हो सकती है। स्त्री रोग विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भ धारण करने की सही उम्र 20 से 21 वर्ष रहती है। इस उम्र तक महिला का शरीर गर्भ धारण करने योग्य हो जाता है। चिकित्सा विभाग के पास तो 15 से 19 वर्ष तक की महिलाओं के गर्भ धारण के भी आंकड़े हैं, जो काफी चिंताजनक है।


हजारों बालिका वधु
जिले में कम उम्र में मां बनने बनने वाली महिलाएं के आंकड़े बाल विवाह पर मुहर लगाते हैं। लेकिन बालिका वधुओं के आंकड़े भी कम चौकाने वाले नहीं है। चिकित्सा विभाग ने हाल ही में जिले में 15 से 45 उम्र की योग्य दम्पतियों का सर्वे कराया। सर्वे में जिले में 3,22,583 महिलाएं विवाह बंधन में बंधी हुई हैं। यहां महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 15-19 वर्ष की 14,800 महिलाएं विवाह बंधन में बंधी हैं। हालांकि बाल विवाह की श्रेणी लड़कियों के लिए 18 वर्ष से कम उम्र में शादी को माना जाता है। चिकित्सा विभाग ने जो आंकड़े जुटाए हैं, वे 15 से 19 वर्ष के बीच के हैं। इनमें 18 से 19 वर्ष के ज्यादा से ज्यादा पांच हजार योग्य दम्पती भी मान लें तो करीब दस हजार बालिका वधुएं जिले में हैं। ये बालिका वधुए पिछले तीन-साल में विवाह बंधन में बंधी है


क्यों करते हैं अपना जीवन बर्बाद
स्कूल में शिक्षण के दौरान ऐसी कई घटनाएं सामने आई जब हमें मालूम हुआ कि फलां लड़की की शादी होने जा रही है। ऐसे में उसके माता-पिता व बड़े भाई को स्कूल बुला कर पूछा कि क्या बात है, आजकल आपकी बच्ची स्कूल नहीं आ रही। पहले तो माता-पिता बहाना बनाते हैं कि तबीयत ठीक नहीं है। दस दिन बाद आएगी। बार-बार पूछने पर माता-पिता बताते हैं कि बच्ची की सगाई हो चुकी है और शादी की तैयारी है। जब मैं यह कहती हूं कि यह तो बाल विवाह है, आप ऐसा न करें। वे कहते हैं कि क्या करें, हम गरीब हैं अभी तो कम पैसा लगेगा। हम लड़की को उसके घर नहीं भेजेंगे, गौना 18 साल बाद ही करेंगे। शादी के बाद बच्ची स्कूल आ जाएगी। ज्यादातर मामलों में शादी के बाद बच्ची स्कूल नहीं आती है। इसी तरह कि एक घटना याद है। एक दिन एक लड़की के पिता स्कूल आए और लड़की को छुट्टी देने का आग्रह किया। उन्होंने बताया कि लड़के वाले आए हुए हैं, अभी संबंध करना है। मैंने कहा लड़की दसवीं कक्षा में पढ़ रही है और बोर्ड की परीक्षा है। आपकी बच्ची अभी बहुत छोटी है, ये क्या कर रहे हैं। लड़की के पिता बोले, मैडम मैं सब जानता हूं, लेकिन मेरी मजबूरी भी तो जानिए। उस दिन तो लड़की के पिता को स्कूल से वापस भेज दिया और लड़की को छुट्टी नहीं दी। पिछले दिनों ही एक छात्रा की मां आई और बोली मुझो मेरी बेटी की टीसी चाहिए। मैंने पूछा, क्यों? मां ने कहा, दसवीं पास कर ली है। इसके पिता अब शादी करना चाहते हैं। मैं तो अनपढ़ हूं, जिद करके इसे दसवीं तक पढ़ाया है। जबकि इसके पिता तो आठवीं के बाद ही इसे पढ़ाना नहीं चाहते थे। लड़की की जिससे सगाई हुई है वह लड़का आठवीं फेल हैं। इसे और पढ़ा कर क्या करें? ससुराल वाले चाहते हैं कि लड़की को आगे नहीं पढ़ाया जाए और वे शादी की जल्दी कर रहे हैं। मैंने कहा, कल लड़की को साथ ले कर आना। अगले दिन लड़की आई, उसे समझााया, बेटा तुम्हें पढऩे की जिद करनी चाहिए थी, शादी का विरोध करना चाहिए। मासूम सी लड़की मेरी बात समझा रही थी, मां भी समझा रही थी। पास होने के बाद लड़की शर्म के मारे अंकतालिका लेने भी नहीं आई। बाद में जब वह अंकतालिका दी और कहा गहनों से ज्यादा अंकतालिका है, इसे संभाल कर रखना। एक उदाहरण तो मेरी आंखों में आंसू भर देता है। कक्षा 11 की बालिका, पढऩे में होशियार, अच्छी खिलाड़ी। कक्षा 11 पास करने के बाद कक्षा 12 में नजर नहीं आई। पता चला कि उसकी शादी हो गई। बड़ा धक्का लगा। उससे बड़ा धक्का जब लगा कि जब वह आठ माह बाद उस लड़की को स्कूल में देखा। कांतिहीन चेहरा, आंखों में सूनापन। मैंने पूछा क्या हुआ, तुम्हारी तो शादी हो गई थी। उसने कहा, दादाजी के कहने से पिताजी ने जल्दी शादी कर दी। ससुराल में उसके साथ पिटाई की गई। तलाक हो गया। मैंने पूछा, अब क्या करोगी? उसने कहा, टीसी दे दो। प्राइवेट 12वीं की पढ़ाई करुंगी। हर साल ऐसे किस्से सामने आते हैं। पता नहीं क्यों लोग बाल विवाह कर बच्चियों की जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं। -


- नूतन बाला कपिला, प्रधानाचार्या,
सेठ मुकनचंद बालिया बालिका स्कूल, पाली


कांपते हुए करते हैं डिलीवरी
लेबर रूम में टेबल पर एक 16-17 साल की गर्भवती महिला लेटी है। उसे देखते ही अहसास होता है कि इतनी कम उम्र में महिला की डिलीवरी करनी है। कई बार तो जटिल मामले आ जाते हैं। अधिकतर मामलों में कम उम्र की गर्भवती की 'पेल्विक बोन्स' ही विकसित नहीं हो पाती। इससे प्रसव के समय काफी परेशानी आती है। पिछले काफी समय से बांगड़ अस्पताल में डिलीवरी करा रही हूं। हर माह चार सौ से साढ़े चार सौ डिलीवरी होती हैं। कम उम्र की महिलाओं की डिलीवरी में काफी डर भी लगता है। अधिकतर मामलों में गर्भवती के शारीरिक रूप से विकसित न होने, खून की कमी, पोषण का अभाव, संतुलित आहार न मिलना और मानसिक रूप से मातृत्व के लिए तैयार नहीं होने जैसे मामले सामने आते हैं। ऐसी स्थिति में अगर बच्चा भारी है तो महिला की सिजेरियन करना पड़ जाता है। कई बार तो 'अवरुद्ध प्रसव' की स्थिति सामने आ जाती है। इससे नवजात की मौत होने की संभावना बनी रहती है। रोजाना ऐसे केसों का सामना करना पड़ता है। कई बार बहुत ही कम उम्र की गर्भवती आ जाती है, उसका प्रसव कराने में डर भी लगता है।
-डॉ. सुशीला आगीवाल, स्त्रीरोग विशेषज्ञ, बांगड़ अस्पताल






बाल विवाह रोक के नियम-कानून
- 1978 में संसद द्वारा बाल विवाह निवारण कानून पारित किया गया। इसमें विवाह की आयु लड़कियों के लिए 18 और लड़कों के लिए 21 साल निर्धारित की गई।
-1929 में शारदा एक्ट बाल विवाह रोक के लिए बनाया।

-बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 की धारा 9 एवं 10 के तहत बाल विवाह के आयोजन पर दो वर्ष तक का कठोर कारावास एवं एक लाख रुपए जुर्माना या दोनों से दंडित करने का प्रावधान है।

 
राज्य की भयावह स्थिति
- 18 वर्ष से कम आयु में विवाहित हो रही लड़कियों का प्रतिशत राज्य में 68 फीसदी है।
-यूनीसेफ के अनुसार राजस्थान में 52 फीसदी विवाह 18 साल में हो जाते हैं।
-राजस्थान में वसुंधरा सरकार में 65 विधायकों का बाल विवाह हुआ था। इनमें से 7 मंत्री भी शामिल हैं।
- जनसंख्या परिषद के हाल में हुए अध्ययन में बताया गया था कि राज्य में 45.5 फीसदी लड़कियोंं की शादी 18 साल से पहले हो जाती है। वहीं 21 वर्ष से पहले शादी करने वाले लड़कों का आंकड़ा 53. 2 फीसदी है।


कुछ तथ्य
- वर्ष 2008 में पूरे देश में बाल विवाह के 108 मामले दर्ज किए गए थे।
-भारत के महिला एवं बाल विकास द्वारा प्रकाशित नेशनल प्लॉन फॉर चिल्ड्रन 2005 के अनुसार वर्ष 2010 तक बाल विवाह को पूर्ण रूप से समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
-बाल विवाह के कारण बाल विधवाओं की संख्या बढ रही है।
-यूनीसेफ के अनुसार भारत में 49 प्रतिशल लड़कियों का विवाह 18 वर्ष से कम आयु में हो जाता है।
-आजकल कलर्स चैनल पर चल रहे धारावाहिक बालिका वधु काफी प्रचलित हुआ है।
-कम उम्र में मां बनने के आंकड़े चौकाने वाले हैं।
-देश में विवाह की उम्र धीरे-धीरे बढ रही है, लेकिन बाल विवाह भी कुप्रथा बदस्तूर जारी है।
- 2001 की जनगणना के अनुसार देश में 18 साल से कम उम्र के 64 लाख लड़के-लड़कियां विवाहित थे।
- मई-2005 में मध्यप्रदेश के धार जिले में बाल विवाह रोकने के प्रयास में जुटी आंगनबाड़ी सुपरवाइजर शंतुलता वर्मा से नाराज एक युवक ने महिला के हाथ काट दिए थे। इसी तरह राजस्थान की भंवरी देवी के साथ भी दुव्र्यवहार किया गया था।
-यूनीसेफ के अनुसार वर्ष 2009 में विश्व में बच्चों की स्थिति पर अध्ययन किया था। उस दौरान यह तथ्य उभरकर आया कि विश्व के बाल विवाहों में चालीस फीसदी बाल विवाह भारत में होते हैं।



मौत पर विवाह
राजस्थान के एक तबके विशेष में बूढ़े लोगों की मौत के बाद 12वें की बैठक के अवसर पर नन्हे बच्चों का विवाह करने की कुप्रथा है। ऐसे संजीदा और गैर पारम्परिक विषय समाज विकास के लिए घातक ही है। कालान्तर में इसमें कुछ कमी आई है, लेकिन कई ग्रामीण इलाकों में ये कुप्रथाएं बदस्तूर जारी है।

Monday, April 26, 2010

कुपोषण में जकड़ा बचपन



राजस्थान पत्रिका पाली में प्रकाशन 23 अप्रेल 2010


कुपोषण में जकड़ा बचपन


राजेश दीक्षित


पाली जिले के मासूमों के शरीर कुपोषण के मारे सिकुड़ रहे हैं। इसका कारण गरीबी हो या कोई और। सरकारी आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि जिले में कुपोषण की स्थिति काफी भयावह है। आंगनबाड़ी केन्द्रों पर पोषाहार लेने आने वाले 48 फीसदी बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं। इसके अलावा 5 फीसदी अति कुपोषित हैं। गौर करने की बात यह है कि जब सरकारी आंकड़े ही इतने हैं तो हकीकत इससे कहीं ज्यादा खतरनाक होगी। हालांकि कुपोषित बच्चों की चिकित्सा व पोषक आहार देने के लिए बांगड़ अस्पताल में कुपोषण केन्द्र भी खोला गया लेकिन आंगनबाड़ी केन्द्रों ने उनके यहां आने वाले कुपोषित बच्चों को कुपोषण केन्द्र भेजने के प्रति रुचि ही नहीं दिखाई। सिर्फ गिने-चुने बच्चे ही इस केन्द्र से लाभान्वित हो सके। महिला एवं बाल विकास विभाग ने भी इस बात को स्वीकारा है कि राज्य के छह जिलों में कुपोषण से पीडि़त बच्चों की संख्या अधिक है, इनमें पाली जिला भी शामिल है।


चलेगा विशेष अभियान


कुपोषण मुक्ति के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग प्रदेश में विशेष अभियान चलाएगा। अभियान के लिए पाली, डूंगरपुर, झाालावाड़, अलवर, बीकानेर व बांसवाड़ा जिले का चयन किया गया। इसके तहत रोगग्रस्त अति कुपोषित बच्चों का केन्द्रों पर नि:शुल्क उपचार किया जाएगा। अभिभावकों को ३० रुपए दैनिक दिए जाएंगे।


मिलता है पौष्टिक आहार


आंगनबाड़ी केन्द्रों पर बच्चों को पोषाहार दिया जाता है। अति कुपोषित बच्चों का साप्ताहिक वजन लेकर उनकी देखरेख कर पृथक से पूरक पोषाहार दिया जाता है। प्रोटीन और विटामिन से भरपूर बेबी मिक्स और दलिया-खिचड़ी दी जाती है। समय-समय पर चिकित्सकों व एएनएम से जांच कराई जाती है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व अन्य कर्मचारी अभिभावकों को बच्चों को पौष्टिक आहार देने की जानकारी देते हैं।


जिले में कुपोषित बच्चे


आंगनबाड़ी केन्द्रों पर बच्चे - 57,778


कुपोषित बच्चे - 28,000


अति कुपोषित बच्चे - 3322


पाली शहर के हालात


आंगनबाड़ी केन्द्रों पर बच्चे - 6687


कुपोषित बच्चे - 2709


अति कुपोषित बच्चे - 364


वजन के आधार पर होती जांच


बच्चों के कुपोषित व सामान्य होने की जांच वजन के आधार पर की जाती है। 5 वर्ष तक के बच्चों के लिए अलग-अलग समय पर अलग-अलग वजन निर्धारित है। निर्धारित से कम वजन होने पर बच्चा कुषोषित श्रेणी में माना जाता है और ज्यादा ही कम वजन होने पर अति कुपोषित माना जाता है।


बच्चे का सामान्य वजन


वर्ष वजन


एक 10


दो 12


तीन 14


चार 16


पांच 18


काम नहीं आया कुपोषण केन्द्र


कुपोषण के शिकार कई बच्चों की हर साल मौत हो जाती है। राजस्थान में स्थिति काफी गम्भीर है। इसी के मद्देनजर 'राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन' की ओर से राजकीय बांगड़ अस्पताल में कुपोषण उपचार केन्द्र खोला गया। यहां अति कुपोषित बच्चों को अस्पताल में भर्ती कर पौष्टिक आहार दिया जाता है लेकिन इसका लाभ कुपोषित बच्चों को नहीं मिल रहा है। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि महिला एवं बाल विकास विभाग को सूचित कर दिया है लेकिन विभाग ने अब तक एक भी अति कुपोषित बच्चे को केन्द्र में भर्ती नहीं कराया।


मां पकाएगी भोजन


कुपोषण केन्द्र में कुपोषित बच्चे की मां ही पौष्टिक भोजन पकाकर बच्चे को खिलाएगी। इसका मकसद मां को पौष्टिक भोजन पकाने का तरीका सिखाना है। अस्पताल में भर्ती कुपोषित बच्चे के साथ ही मां को भी रखा जाएगा। इसके लिए मां को रोजाना तीस रुपए दिए जाएंगे।


आठ पलंग और रसोई


कुपोषण उपचार केन्द्र आठ बेड का है। इसमें एक बेड पर कुपोषित बच्चा व मां दोनों रहेंगे। केन्द्र में एक रसोई बनाई गई है। इसमें आहार पकाने का सामान है। केन्द्र में नर्सिंग स्टॉफ व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व्यवस्थाएं संभालेंगे।


पांच वर्ष से छोटे बच्चे रहेंगे


केन्द्र में गम्भीर रूप से कुपोषित पांच वर्ष तक के बच्चों को रखा जाएगा। इसकी पहचान बच्चे की औसत उम्र व वजन के आधार पर की जाती है। बच्चे का सामान्य वजन से बीस प्रतिशत वजन कम है तो स्थिति सामान्य मान ली जाती है लेकिन सामान्य वजन से साठ फीसदी कम होने पर गम्भीर कुपोषित की श्रेणी होती है।


यह होता है कुपोषण


शरीर के लिए आवश्यक संतुलित आहार लम्बे समय तक नहीं मिलना ही कुपोषण है। कुपोषण के कारण बच्चों व महिलाओं की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। इससे वे कई बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। स्त्रियों में रक्ताल्पता व घेंघा व बच्चों में सूखा व रतौंधी रोग कुपोषण के ही परिणाम हैं।


कुपोषण के लक्षण


- शरीर की वृद्धि रुकना।


- मांसपेशियां ढीली होना अथवा सिकुड़ जाना।


- झाुर्रियों युक्त पीले रंग की त्वचा।


- कार्य करने पर शीघ्र थकान आना।


- मन में उत्साह का अभाव, चिड़चिड़ापन तथा घबराहट होना।


- बाल रुखे और चमक रहित होना।


- आंखें धंसी व उनके चारों ओर काला वृत्त बनाना।


- शरीर का वजन कम होना तथा कमजोरी


- नींद तथा पाचन क्रिया का गड़बड़ा जाना।


- हाथ-पैर पतले और पेट बढ़ा होना या शरीर में सूजन आना।


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राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 3 (एनएफएचएस-3) बताता है कि देश में छह साल से कम उम्र के आठ करोड़ बच्चे कुपोषित हैं। फूला पेट, अविकसित कद-काठी, झारते बाल और फीके रंग के साथ जी रहे हैं। एक साल के बच्चे का वजन औसतन दस किलोग्राम होता है। उसके वजन में सालाना दो किलोग्राम बढ़ोतरी होना जरूरी है। मगर जब बच्चों का वजन सामान्य से कम होने लगता है तो यह कुपोषण की स्थिति है। ऐसी स्थिति में उसकी बीमारियों से लडऩे की क्षमता कम हो जाती है। ऐसे बच्चों को अधिक से अधिक प्रोटीन, कार्बोहाइडे्रट, आयरन, विटामिन-बी, कैल्शियम आदि मिलना चाहिए। यहां बच्चों में कुपोषण का मुख्य कारण गरीबी, उचित पालन-पोषण का अभाव और उनके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की गिरती स्थितियां है। उनके आस-पास के माहौल में साफ-सफाई और पीने का स्वच्छ पानी न होने के कारण यह और अधिक गहराता जा रहा है।


- यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के ६ करोड़ से ज्यादा बच्चे भूखे सोने को मजबूर हैं।


- भारत के महापंजीयक कार्यालय द्वारा जारी प्रतिवेदन का ही अध्ययन करें तो देश में वर्ष २००८ में नवजात शिशु मृत्यु दर एक हजार बच्चों पर ५३ फीसदी थी।


- निमोनिया, डायरिया और अन्य रोगों के कारण जिन बच्चों की मौत होती है। उनमें से एक तिहाई से अधिक अगर कुपोषण का शिकार न हों तो उन्हें बचाया जा सकता है।


- जो महिलाएं पहले से ही कुपोषण का शिकार हैं तो वे कुपोषित बच्चों को जन्म देती हैं। अगर जन्म के बाद भी बच्चे को संतुलित आहार नहीं मिल पाए तो वह जिंदगी भर कुपोषित बना रहता है।


- भारत में हर तीन गर्भवती महिलाओं में से एक कुपोषण की शिकार होने के कारण खून की कमी अर्थात रक्ताल्पता की बीमारी से ग्रस्त हो जाती है। हमारे समाज में स्त्रियां अपने स्वयं के खान-पान पर ध्यान नहीं देती जबकि गर्भवती महिलाओं को ज्यादा पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है। उचित पोषण के अभाव में गर्भवती महिलाएं स्वयं तो रोगग्रस्त होती ही हैं, साथ ही होने वाले बच्चे को कमजोर और रोग ग्रस्त बना देती हैं। अक्सर महिलाएं पूरे परिवार को खिलाकर स्वयं बचा हुआ रूखा-सूखा खाना खाती हैं, जो उनके लिए अपर्याप्त होता है।






रोजाना आते हैं दस फीसदी कुपोषित बच्चे


राजकीय बांगड़ अस्पताल के ओपीडी में रोजाना आने वाले बच्चों में से करीब दस फीसदी कुपोषण्ध का शिकार होते हैं। संतुलित आहार के लिए प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन व मिनरलस जरूरी है। गरीब परिवार के बच्चे कुपोषण ही चपेट में ज्यादा आते हैं। इनमें लड़कियां अधिक हैं। अशिक्षा के कारण महिलाएं अधिक बच्चों को जन्म देती हैं। ऐसी स्थिति में अंतिम बच्चे में कुपोषण के लक्षण ज्यादा मिलते हैं। इसी तरह दो बच्चों के जन्म में कम अंतराल रखने पर गर्भवती को पूरा आहार नहीं मिल पाता, इससे नवजात के कुपोषित पैदा होने की आशंका बन जाती है। जिले में रोजाना चार-पांच बच्चे कुपोषित पैदा होते हैं। जन्म के समय नवजात का वजन एक से ढाई किलो के बीच होना कुपोषण है। कुपोषित बच्चे की मौत की ज्यादा आशंका रहती है। कुपोषित नवजात में हाइपोग्लासिमिया (ग्लूकोज की कमी), हाइपोकैल्शियम (कैल्शियम की कमी), हाइपोथरमिया (नवजात का शरीर ठंडा पडऩा) व संक्रमण हो जाता है।


- डॉ. देवेन्द्र चौधरी, शिशु रोग विशेषज्ञ, राजकीय बांगड़ चिकित्सालय


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हर रोज चार कुपोषित बच्चों का जन्म


नवजात का वजन कम होना कुपोषण है। जिले में कम वजन के बच्चों की संख्या पर नजर डालें तो स्थिति चिंताजनक है। सामान्य नवजात का वजन ढाई किलो होता है जबकि जिले में हर रोज चार बच्चे ऐसे पैदा हो रहे हैं जिनका वजन डेढ़ किलो से भी कम है। ऐसे बच्चों को संभालना, स्तनपान कराना और उन्हें स्वस्थ बनना कठिन हो जाता है। ढाई किलो से कम वजन के बच्चों का आंकड़ा इससे कई ज्यादा है। कुल मिलाकर पिछले तीन माह में ही नौ फीसदी से अधिक बच्चे कम वजन के पैदा हुए हैं।


कम वजन के बच्चों की स्थिति


माह जन्म लेने वाले बच्चे डेढ़ किलो से कम डेढ़ व ढाई किलो के बीच


जनवरी 3205 48 308


फरवरी 3303 42 288


मार्च 3077 30 221


कुल 9585 120 817






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Saturday, February 27, 2010

पाली नगर परिषद के विजयी पार्षदों के नाम व पार्टी

नगर परिषद के 2009

पाली नगर परिषद के विजयी पार्षदों के नाम व पार्टी

 वार्ड            नाम                                      पार्टी

वार्ड--1        सुमित्रा शर्मा-                           कांग्रेस

वार्ड-2-         राजश्री त्रिवेदी-                          कांग्रेस

वार्ड-3-          बाबूसिंह-                                   भाजपा

वार्ड-4-          संतोष-                                       भाजपा

वार्ड-5-         लक्ष्मी देवी-                                  भाजपा

वार्ड-6-        जमकू देवी-                                     निर्दलीय

वार्ड-7         -जयसिंह राजपुरोहित-                       कांग्रेस

वार्ड-8-          मनीष जैन-                                    भाजपा

वार्ड-9-           बबली देवी-                                  निर्दलीय

वार्ड-10  -         त्रिभुवन सिंह-                              भाजपा

वार्ड-11-          मोटू भाई देवीदास-                       कांग्रेस

वार्ड-12-           देवपाल-                                       कांग्रेस

वार्ड-13-           संदीप सुराणा-                              भाजपा

वार्ड-14-            लीला देवी-                                  कांग्रेस

वार्ड-15-             फकीर मोहम्मद-                          निर्दलीय

वार्ड-16-               खुमेश्री बोराणा-                            कांग्रेस

वार्ड-17-               राधेश्याम चौहान-                         भाजपा

वार्ड-18-                 शमीम मोतीवाला-                        कांग्रेस

वार्ड-19-                     हकीम भाई-                               कांग्रेस

वार्ड-20-                      मेहबूब टी-                                  कांग्रेस

वार्ड-21-                    सुरेश चौधरी-                              भाजपा

वार्ड-22-                  नयना व्यास-                                भाजपा (निर्विरोध)

वार्ड-23-                      खातून बानो-                            कांग्रेस

वार्ड-24-                   श्यामसिंह केसावत-                      भाजपा

वार्ड-25-                       फरीदा बानो-                            कांग्रेस

वार्ड-26-                     किशोर कुमार सोमनानी-           भाजपा

वार्ड-27-                         जेठाराम भील-                      कांग्रेस

वार्ड-28-                        अभिषेक चौपड़ा-                     कांग्रेस

वार्ड-29-                           ताराकंवर गहलोत-              भाजपा

वार्ड-30-                             विनोद कुमार-                  कांग्रेस

वार्ड-31-                            मीनादेवी प्रीतमानी-           भाजपा

वार्ड-32-                             घेवरचंद पटेल-                 भाजपा

वार्ड-33-                              राकेश भाटी-                   भाजपा

वार्ड-34-                              दिलीप कुमार ओड-        कांग्रेस

वार्ड-35-                                 कमला देवी-                 कांग्रेस

वार्ड-36-                                  मोहनलाल-                 कांगे्रस

वार्ड-37-                                  रामीदेवी-                     कांग्रेस

वार्ड-38-                                  निरमा देवी-                कांग्रेस

वार्ड-39-                                   आनंद कंवर-              भाजपा

वार्ड-40-                          रामेश्वर प्रसाद-                        कांग्रेस

वार्ड-41-                              तिलोकराम-                       भाजपा

वार्ड-42-                          विजय लक्ष्मी-                         निर्दलीय

वार्ड-43-                             राधा राव-                              निर्दलीय

वार्ड-44-                            गणपत लाल-                         भाजपा

वार्ड-45-                              कृष्णा कंवर-                         निर्दलीय

Saturday, February 20, 2010

पाली के प्रधान

पाली पंचायत समिति के अब तक के प्रधान

                       नाम                         कब से कब तक                                    पार्टी

1. केसरीसिंह रुपावास                    1959 से 1960                                        जनसंघ

2. केसरीसिंह रुपावास                    1960 से 1962                                        जनसंघ

3.मोहनलाल जैन                           1962 से 1976                                        कांग्रेस

4.भवानी सिंह                                 8.2.1965 से 1976                                 कांग्रेस

5.भंवरलाल मेहता                        1.1.82 से 2.7.88                                       कांग्रेस

6. प्रियव्रतसिंह रुपावास                 21.7.88 से 11.7.91                                 कांग्रेस

7. प्रियव्रतसिंह रुपावास                16.2.95 से 11.2.2000                            कांग्रेस

8.प्रियव्रतसिंह रुपावास                 11.2.2000 से 10.2.2005                           कांग्रेस

9. श्रीमती इंदु मीणा                      11.2.2005 से 11.2.2010                          भाजपा

10. सुश्री शोभा                               11.2.2010 से अब तक                           कांग्रेस

Friday, February 19, 2010

पाली जिले के सांसद

पाली जिले के सांसद

1952से अब तक

वर्ष                                    सांसद                                                    पार्टी

1952                               अजीत सिंह                                              निर्दलीय

1957                            हरीश चंद्र माथुर                                           कांग्रेस

1962                           जावंत राय मेहता                                          कांग्रेस

1967                            सुरेंद्र कुमार तापडिय़ा                                     स्वतंत्र पार्टी

1971                            मूलचंद डागा                                                     कांग्रेस

1977                             अमृत नाहटा                                                    जनता पार्टी

1980                              मूलचंद डागा                                                      कांग्रेस

1984                               मूलचंद डागा                                                      कांग्रेस

1988 (उपचुनाव)              शंकरलाल                                                            कांग्रेस

1989                              गुमानमल लोढ़ा                                                    भाजपा

1991                             गुमानमल लोढ़ा                                                     भाजपा

1996                            गुमानमल लोढ़ा                                                      भाजपा

1998                            मीठालाल जैन                                                        कांग्रेस

1999                                पुष्प जैन                                                            भाजपा

2004                              पुष्प जैन                                                              भाजपा

2009                                 बद्रीराम जाखड़                                                  कांग्रेस

अब तक के जिला प्रमुख/ प्रशासक

नाम जिला प्रमुख/ प्रशासक कब से कब तक पार्टी

1. हरिश चंद माथुर                  जिला प्रमुख                      1961 से 4.1.62 कांग्रेस


2. शंकरलाल                              जिला प्रमुख                     5.1.62 से 26.2.62 कांग्रेस


3. फूलचंद बाफणा                     जिला प्रमुख                      27.2.62 से 28.2.65 स्वतंत्र पार्टी


4. सज्जन सिंह                           जिला प्रमुख                     1.3.65 से 31.8.77 स्वतंत्र पार्टी


5. प्रियदर्शी ठाकुर                        प्रशासक (आईएएस)           31.8.77 से 30.8.77


6. गजेन्द्र हल्दिया                         प्रशासक (आईएएस)            25.5.78 से 11.7.79


7. आनंद प्रसाद सक्सेना          प्रशासक (आईएएस)            12.7.81 से 17.2.81


8. के.एल.मीणा                           प्रशासक (आईएएस)          18.2.81 से 11.1.82


9. सी.धर्मीचंद जैन                    जिला प्रमुख                     11.1.82 से 4.8.91 कांग्रेस


10. तपेश पंवार                     प्रशासक (आईएएस)               4.8.91 से 9.5.92


11. श्रीमत पाण्डेय              प्रशासक (आईएएस)               9.5.92 से 9.9.94


12. मुकेश शर्मा                   प्रशासक (आईएएस)              9.9.94 से 14.2.95


13. श्रीमती सुशीलकुमारी        जिला प्रमुख                      14.2.95 से 2.2.2000 भाजपा


14. चतराराम सीरवी              जिला प्रमुख                        13.2.2000 से 11.2.2005 भाजपा


15. सुश्री ममता मेघवाल          जिला प्रमुख                        11.2.2005 से 11.2.2010 भाजपा


16. खुशवीर सिंह               जिला प्रमुख                11.2.2010 से         अब तक कांग्रेस

पाली के विधायक

पाली विधानसभा

वर्ष विधायक हारे

1952 बिशनसिंह-निर्दलीय मूलचंद डागा-कांग्रेस

1957 मूलचंद डागा-कांग्रेस मोहनलाल-कम्यूनिष्ट

1962 केसरीसिंह-एसडब्लयूटी मूलचंद डागा-कांग्रेस

1967 मूलचंद डागा-कांग्रेस केसरीसिंह-एसडब्लयूटी

1972 शंकरलाल-कांग्रेस किसनाराम-निर्दलीये

1977 मूलचंद डागा-कांग्रेस छोगालाल गादिया-जनता पार्टी

1980 माणकलाल मेहता-कांग्रेस-आई केसरीसिंह-भाजपा

1985 पुष्पादेवी- भाजपा शौकत अली-कांग्रेस

1990 पुष्पा देवी-भाजपा भीमराज भाटी-कांग्रेस

1993 भीमराज भाटी-निर्दलीय पुष्पा देवी-भाजपा

1998 ज्ञानचंद पारख-भाजपा भीमराज भाटी-कांग्रेस

2003 ज्ञानचंद पारख-भाजपा भीमराज भाटी-कांग्रेस

2009 ज्ञानचंद पारख-भाजपा भीमराज भाटी-निर्दलीय

शेर

जिंदगी बड़ी अजीब होती है

कभी हार तो कभी जीत होती है

तमन्ना रखो संमदर की

गहराइयों को छूने की

किनारों पर तो जिंदगी की शुरुआत होती है।