Monday, May 17, 2010
सिंदूर में खोया बचपन
सिंदूर में खोया बचपन
अधिक उम्र में शादी के क्रेज के बीच बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं अब भी हमारे समाज के लिए नासूर बनी हुई हैं। इस कुप्रथा को रोकने के लिए न जाने कितने कानून बनाए गए। हर साल बाल विवाह रोकने के लिए सरकार ने भी नए-नए आदेश जारी किए, लेकिन सामाजिक बुराई नहीं रुक रही है। पाली जिला भी बाल विवाह जैसी बुराई से अछूता नहीं है। हर साल आखातीज पर नन्हें-नन्हें मासूम बच्चे विवाह की डोर में बंध रहे हैं, लेकिन प्रशासनिक अमला इन विवाहों को रोकने में पूरी तरह से ही नाकाम ही रहा है। सामाजिक बुराई को समाप्त करने के लिए कानून के डंडे की अपेक्षा सामाजिक जागरूकता बहुत जरुरी है, और इसी जागरूकता के अभाव के कारण ही यह सामाजिक परम्परा आज भी कायम है। खेलने-कूदने व पढने-लिखने की उम्र में बालिकाएं माथे पर सिंदूर लिए घूमती है। सिंदूर ने उनका बचपन छीन लिया है।
पाली में बाल विवाह की स्थिति
- हर साल डेढ हजार, कम उम्र की मां
-सरकार लाख कोशिशों के बाद भी बाल विवाह को रोकने में सफल नहीं हो पा रही है। कम उम्र में शादी का मतलब सीधा-सीधा है कि खेलने-कूदने व स्कूल जाने की उम्र में लड़की की गोद में बच्चे खेलने लग जाती है। लड़की छोटी सी उम्र में ही मां बन जाती है। ऐसी स्थिति में लड़की व बच्चे के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है।
जिले में स्थिति बड़ी भयावह है। बाल विवाह का ही नतीजा है कि जिले में हर माह और एक सौ बीस छोटी उम्र की लड़कियां गर्भ धारण कर रही है। चिकित्सा विभाग के आंकड़े बड़े चौकाने वाले हैं। वर्ष 2008-09 में 1455 ऐसी महिलाएं गर्भवती हुई जिनकी उम्र केवल 15 से 19 वर्ष के बीच थी।
जबकि स्त्रीरोग विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भधारण करने की सही व उचित उम्र 21 से 30 वर्ष के बीच है। कम उम्र में गर्भधारण करना जच्चा-बच्चा दोनों के लिए मुसीबत ही है।
कम उम्र में मां बनने के नुकसान
- कम उम्र की महिलाओं में गर्भकाल के दौरान खून की कमी, ब्लड प्रेशर ज्यादा होना, डिलेवरी के समय ब्लीडिंग होना, बच्चेदानी फट जाना व तकलीफ से डिलीवरी होने की संभावना बनी रहती है।
बाल विवाह जैसी कुप्रथा के चलते जल्द उम्र में शादी होने से कम उम्र में ही महिला मां बन जाती है। कई बार 15-16 की उम्र में ही गर्भधारण कर लिया जाता है। ऐसी स्थिति के दौरान गर्भाशय परिपक्व नहीं होने के कारण गर्भ में पल रहा शिशु पूर्ण विकसित नहीं हो पाता है। इसके अलावा गर्भ धारण करने में अंतर नहीं होने पर शिशु की सेहत कमजोर हो जाती है। कम उम्र में मां बनने से शिशु का वजन कम होता है। इससे कई समस्याएं आती हैं।
कम उम्र में मां, ना बाबा ना
कम उम्र में मां बनने के भी कई मामले सामने आ रहे हैं। इससे न मां का स्वास्थ्य सही रहता है और न ही बच्चे का। बल्कि कम उम्र में गर्भधारण करना खुद व बच्चे की मौत को बुलाने के समान ही है। कई मामलों में तो गर्भपात हो जाता है। बच्चा कमजोर पैदा होगा या फिर विमंदित। एक सप्ताह से लेकर एक साल के अंदर बच्चे की मौत भी हो सकती है। स्त्री रोग विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भ धारण करने की सही उम्र 20 से 21 वर्ष रहती है। इस उम्र तक महिला का शरीर गर्भ धारण करने योग्य हो जाता है। चिकित्सा विभाग के पास तो 15 से 19 वर्ष तक की महिलाओं के गर्भ धारण के भी आंकड़े हैं, जो काफी चिंताजनक है।
हजारों बालिका वधु
जिले में कम उम्र में मां बनने बनने वाली महिलाएं के आंकड़े बाल विवाह पर मुहर लगाते हैं। लेकिन बालिका वधुओं के आंकड़े भी कम चौकाने वाले नहीं है। चिकित्सा विभाग ने हाल ही में जिले में 15 से 45 उम्र की योग्य दम्पतियों का सर्वे कराया। सर्वे में जिले में 3,22,583 महिलाएं विवाह बंधन में बंधी हुई हैं। यहां महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 15-19 वर्ष की 14,800 महिलाएं विवाह बंधन में बंधी हैं। हालांकि बाल विवाह की श्रेणी लड़कियों के लिए 18 वर्ष से कम उम्र में शादी को माना जाता है। चिकित्सा विभाग ने जो आंकड़े जुटाए हैं, वे 15 से 19 वर्ष के बीच के हैं। इनमें 18 से 19 वर्ष के ज्यादा से ज्यादा पांच हजार योग्य दम्पती भी मान लें तो करीब दस हजार बालिका वधुएं जिले में हैं। ये बालिका वधुए पिछले तीन-साल में विवाह बंधन में बंधी है
क्यों करते हैं अपना जीवन बर्बाद
स्कूल में शिक्षण के दौरान ऐसी कई घटनाएं सामने आई जब हमें मालूम हुआ कि फलां लड़की की शादी होने जा रही है। ऐसे में उसके माता-पिता व बड़े भाई को स्कूल बुला कर पूछा कि क्या बात है, आजकल आपकी बच्ची स्कूल नहीं आ रही। पहले तो माता-पिता बहाना बनाते हैं कि तबीयत ठीक नहीं है। दस दिन बाद आएगी। बार-बार पूछने पर माता-पिता बताते हैं कि बच्ची की सगाई हो चुकी है और शादी की तैयारी है। जब मैं यह कहती हूं कि यह तो बाल विवाह है, आप ऐसा न करें। वे कहते हैं कि क्या करें, हम गरीब हैं अभी तो कम पैसा लगेगा। हम लड़की को उसके घर नहीं भेजेंगे, गौना 18 साल बाद ही करेंगे। शादी के बाद बच्ची स्कूल आ जाएगी। ज्यादातर मामलों में शादी के बाद बच्ची स्कूल नहीं आती है। इसी तरह कि एक घटना याद है। एक दिन एक लड़की के पिता स्कूल आए और लड़की को छुट्टी देने का आग्रह किया। उन्होंने बताया कि लड़के वाले आए हुए हैं, अभी संबंध करना है। मैंने कहा लड़की दसवीं कक्षा में पढ़ रही है और बोर्ड की परीक्षा है। आपकी बच्ची अभी बहुत छोटी है, ये क्या कर रहे हैं। लड़की के पिता बोले, मैडम मैं सब जानता हूं, लेकिन मेरी मजबूरी भी तो जानिए। उस दिन तो लड़की के पिता को स्कूल से वापस भेज दिया और लड़की को छुट्टी नहीं दी। पिछले दिनों ही एक छात्रा की मां आई और बोली मुझो मेरी बेटी की टीसी चाहिए। मैंने पूछा, क्यों? मां ने कहा, दसवीं पास कर ली है। इसके पिता अब शादी करना चाहते हैं। मैं तो अनपढ़ हूं, जिद करके इसे दसवीं तक पढ़ाया है। जबकि इसके पिता तो आठवीं के बाद ही इसे पढ़ाना नहीं चाहते थे। लड़की की जिससे सगाई हुई है वह लड़का आठवीं फेल हैं। इसे और पढ़ा कर क्या करें? ससुराल वाले चाहते हैं कि लड़की को आगे नहीं पढ़ाया जाए और वे शादी की जल्दी कर रहे हैं। मैंने कहा, कल लड़की को साथ ले कर आना। अगले दिन लड़की आई, उसे समझााया, बेटा तुम्हें पढऩे की जिद करनी चाहिए थी, शादी का विरोध करना चाहिए। मासूम सी लड़की मेरी बात समझा रही थी, मां भी समझा रही थी। पास होने के बाद लड़की शर्म के मारे अंकतालिका लेने भी नहीं आई। बाद में जब वह अंकतालिका दी और कहा गहनों से ज्यादा अंकतालिका है, इसे संभाल कर रखना। एक उदाहरण तो मेरी आंखों में आंसू भर देता है। कक्षा 11 की बालिका, पढऩे में होशियार, अच्छी खिलाड़ी। कक्षा 11 पास करने के बाद कक्षा 12 में नजर नहीं आई। पता चला कि उसकी शादी हो गई। बड़ा धक्का लगा। उससे बड़ा धक्का जब लगा कि जब वह आठ माह बाद उस लड़की को स्कूल में देखा। कांतिहीन चेहरा, आंखों में सूनापन। मैंने पूछा क्या हुआ, तुम्हारी तो शादी हो गई थी। उसने कहा, दादाजी के कहने से पिताजी ने जल्दी शादी कर दी। ससुराल में उसके साथ पिटाई की गई। तलाक हो गया। मैंने पूछा, अब क्या करोगी? उसने कहा, टीसी दे दो। प्राइवेट 12वीं की पढ़ाई करुंगी। हर साल ऐसे किस्से सामने आते हैं। पता नहीं क्यों लोग बाल विवाह कर बच्चियों की जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं। -
- नूतन बाला कपिला, प्रधानाचार्या,
सेठ मुकनचंद बालिया बालिका स्कूल, पाली
कांपते हुए करते हैं डिलीवरी
लेबर रूम में टेबल पर एक 16-17 साल की गर्भवती महिला लेटी है। उसे देखते ही अहसास होता है कि इतनी कम उम्र में महिला की डिलीवरी करनी है। कई बार तो जटिल मामले आ जाते हैं। अधिकतर मामलों में कम उम्र की गर्भवती की 'पेल्विक बोन्स' ही विकसित नहीं हो पाती। इससे प्रसव के समय काफी परेशानी आती है। पिछले काफी समय से बांगड़ अस्पताल में डिलीवरी करा रही हूं। हर माह चार सौ से साढ़े चार सौ डिलीवरी होती हैं। कम उम्र की महिलाओं की डिलीवरी में काफी डर भी लगता है। अधिकतर मामलों में गर्भवती के शारीरिक रूप से विकसित न होने, खून की कमी, पोषण का अभाव, संतुलित आहार न मिलना और मानसिक रूप से मातृत्व के लिए तैयार नहीं होने जैसे मामले सामने आते हैं। ऐसी स्थिति में अगर बच्चा भारी है तो महिला की सिजेरियन करना पड़ जाता है। कई बार तो 'अवरुद्ध प्रसव' की स्थिति सामने आ जाती है। इससे नवजात की मौत होने की संभावना बनी रहती है। रोजाना ऐसे केसों का सामना करना पड़ता है। कई बार बहुत ही कम उम्र की गर्भवती आ जाती है, उसका प्रसव कराने में डर भी लगता है।
-डॉ. सुशीला आगीवाल, स्त्रीरोग विशेषज्ञ, बांगड़ अस्पताल
बाल विवाह रोक के नियम-कानून
- 1978 में संसद द्वारा बाल विवाह निवारण कानून पारित किया गया। इसमें विवाह की आयु लड़कियों के लिए 18 और लड़कों के लिए 21 साल निर्धारित की गई।
-1929 में शारदा एक्ट बाल विवाह रोक के लिए बनाया।
-बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 की धारा 9 एवं 10 के तहत बाल विवाह के आयोजन पर दो वर्ष तक का कठोर कारावास एवं एक लाख रुपए जुर्माना या दोनों से दंडित करने का प्रावधान है।
राज्य की भयावह स्थिति
- 18 वर्ष से कम आयु में विवाहित हो रही लड़कियों का प्रतिशत राज्य में 68 फीसदी है।
-यूनीसेफ के अनुसार राजस्थान में 52 फीसदी विवाह 18 साल में हो जाते हैं।
-राजस्थान में वसुंधरा सरकार में 65 विधायकों का बाल विवाह हुआ था। इनमें से 7 मंत्री भी शामिल हैं।
- जनसंख्या परिषद के हाल में हुए अध्ययन में बताया गया था कि राज्य में 45.5 फीसदी लड़कियोंं की शादी 18 साल से पहले हो जाती है। वहीं 21 वर्ष से पहले शादी करने वाले लड़कों का आंकड़ा 53. 2 फीसदी है।
कुछ तथ्य
- वर्ष 2008 में पूरे देश में बाल विवाह के 108 मामले दर्ज किए गए थे।
-भारत के महिला एवं बाल विकास द्वारा प्रकाशित नेशनल प्लॉन फॉर चिल्ड्रन 2005 के अनुसार वर्ष 2010 तक बाल विवाह को पूर्ण रूप से समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
-बाल विवाह के कारण बाल विधवाओं की संख्या बढ रही है।
-यूनीसेफ के अनुसार भारत में 49 प्रतिशल लड़कियों का विवाह 18 वर्ष से कम आयु में हो जाता है।
-आजकल कलर्स चैनल पर चल रहे धारावाहिक बालिका वधु काफी प्रचलित हुआ है।
-कम उम्र में मां बनने के आंकड़े चौकाने वाले हैं।
-देश में विवाह की उम्र धीरे-धीरे बढ रही है, लेकिन बाल विवाह भी कुप्रथा बदस्तूर जारी है।
- 2001 की जनगणना के अनुसार देश में 18 साल से कम उम्र के 64 लाख लड़के-लड़कियां विवाहित थे।
- मई-2005 में मध्यप्रदेश के धार जिले में बाल विवाह रोकने के प्रयास में जुटी आंगनबाड़ी सुपरवाइजर शंतुलता वर्मा से नाराज एक युवक ने महिला के हाथ काट दिए थे। इसी तरह राजस्थान की भंवरी देवी के साथ भी दुव्र्यवहार किया गया था।
-यूनीसेफ के अनुसार वर्ष 2009 में विश्व में बच्चों की स्थिति पर अध्ययन किया था। उस दौरान यह तथ्य उभरकर आया कि विश्व के बाल विवाहों में चालीस फीसदी बाल विवाह भारत में होते हैं।
मौत पर विवाह
राजस्थान के एक तबके विशेष में बूढ़े लोगों की मौत के बाद 12वें की बैठक के अवसर पर नन्हे बच्चों का विवाह करने की कुप्रथा है। ऐसे संजीदा और गैर पारम्परिक विषय समाज विकास के लिए घातक ही है। कालान्तर में इसमें कुछ कमी आई है, लेकिन कई ग्रामीण इलाकों में ये कुप्रथाएं बदस्तूर जारी है।
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चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है। जागृति अभियान जारी रखें।
ReplyDeleteहिंदी ब्लागिंग को आप और ऊंचाई तक पहुंचाएं, यही कामना है।
इंटरनेट से घर बैठे आमदनी की इच्छा हो तो यहां पधार सकते हैं -
http://gharkibaaten.blogspot.com
हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
ReplyDeleteकृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें
" बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नहीं हो सकता "
ReplyDeleteहिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति.कॉम "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . अपने राजनैतिक , सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक और मीडिया से जुडे आलेख , कविता , कहानियां , व्यंग आदि जनोक्ति पर पोस्ट करने के लिए नीचे दिए गये लिंक पर जाकर रजिस्टर करें . http://www.janokti.com/wp-login.php?action=register,
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